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    Shri Shivastak : पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हर - Forum

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    Forum » Main » Vedic mantras/ chants / Chakra / Kundalini Yoga » Shri Shivastak : पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हर (ॐ नमः शिवाय)
    Shri Shivastak : पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हर
    ManuDate: Monday, 27-June-2011, 5:25 PM | Message # 1
    --dragon lord--
    Group: undead
    Messages: 12779
    Status: Offline


    श्री शिवाष्टक

    जय शिवशंकर, जय गंगाधर, करुणा-कर करतार हरे,

    जय कैलाशी, जय अविनाशी, सुखराशि, सुख-सार हरे

    जय शशि-शेखर, जय डमरू-धर जय-जय प्रेमागार हरे,

    जय त्रिपुरारी, जय मदहारी, अमित अनन्त अपार हरे,

    निर्गुण जय जय, सगुण अनामय, निराकार साकार हरे।

    पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

    जय रामेश्वर, जय नागेश्वर वैद्यनाथ, केदार हरे,

    मल्लिकार्जुन, सोमनाथ, जय, महाकाल ओंकार हरे,

    त्र्यम्बकेश्वर, जय घुश्मेश्वर भीमेश्वर जगतार हरे,

    काशी-पति, श्री विश्वनाथ जय मंगलमय अघहार हरे,

    नील-कण्ठ जय, भूतनाथ जय, मृत्युंजय अविकार हरे।

    पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

    जय महेश जय जय भवेश, जय आदिदेव महादेव विभो,

    किस मुख से हे गुरातीत प्रभु! तव अपार गुण वर्णन हो,

    जय भवकार, तारक, हारक पातक-दारक शिव शम्भो,

    दीन दुःख हर सर्व सुखाकर, प्रेम सुधाधर दया करो,

    पार लगा दो भव सागर से, बनकर कर्णाधार हरे।

    पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

    जय मन भावन, जय अति पावन, शोक नशावन,

    विपद विदारन, अधम उबारन, सत्य सनातन शिव शम्भो,

    सहज वचन हर जलज नयनवर धवल-वरन-तन शिव शम्भो,

    मदन-कदन-कर पाप हरन-हर, चरन-मनन, धन शिव शम्भो,

    विवसन, विश्वरूप, प्रलयंकर, जग के मूलाधार हरे।

    पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

    भोलानाथ कृपालु दयामय, औढरदानी शिव योगी, सरल हृदय,

    अतिकरुणा सागर, अकथ-कहानी शिव योगी, निमिष में देते हैं,

    नवनिधि मन मानी शिव योगी, भक्तों पर सर्वस्व लुटाकर, बने मसानी

    शिव योगी, स्वयम्‌ अकिंचन,जनमनरंजन पर शिव परम उदार हरे।

    पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

    आशुतोष! इस मोह-मयी निद्रा से मुझे जगा देना,

    विषम-वेदना, से विषयों की मायाधीश छड़ा देना,

    रूप सुधा की एक बूँद से जीवन मुक्त बना देना,

    दिव्य-ज्ञान- भंडार-युगल-चरणों को लगन लगा देना,

    एक बार इस मन मंदिर में कीजे पद-संचार हरे।

    पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

    दानी हो, दो भिक्षा में अपनी अनपायनि भक्ति प्रभो,

    शक्तिमान हो, दो अविचल निष्काम प्रेम की शक्ति प्रभो,

    त्यागी हो, दो इस असार-संसार से पूर्ण विरक्ति प्रभो,

    परमपिता हो, दो तुम अपने चरणों में अनुरक्ति प्रभो,

    स्वामी हो निज सेवक की सुन लेना करुणा पुकार हरे।

    पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

    तुम बिन ‘बेकल’ हूँ प्राणेश्वर, आ जाओ भगवन्त हरे,

    चरण शरण की बाँह गहो, हे उमारमण प्रियकन्त हरे,

    विरह व्यथित हूँ दीन दुःखी हूँ दीन दयालु अनन्त हरे,

    आओ तुम मेरे हो जाओ, आ जाओ श्रीमंत हरे,

    मेरी इस दयनीय दशा पर कुछ तो करो विचार हरे।

    पार्वती पति हर-हर शम्भो, पाहि पाहि दातार हरे॥

    ॥ इति श्री शिवाष्टक स्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥


    untotenawake

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